असीम

सात फेरे लिए हैं रोहिमा तूने,

विवाह के 22 वर्ष हो चुके हैं।

आज तेरा मन इतना विचलित कैसे है?

संभाल अपने को..!

अतीत को देखकर तो अपनी सुध बुध कैसे खो सकती है?

बच्चे बड़े हो गए हैं बालिग हो गए हैं उन्हें सही गलत समझाने की उम्र है तेरी।

परंतु रोहिमा का अपने ऊपर वश न था।

वह अपने तन बदन से उसका नाम, उसका अस्तित्व सब कुछ अस्वीकार करना चाहती थी। यहां तक कि विवाह के उपरांत उसने कभी उसका नाम भी अपनी जुबान पर नहीं रखा था।

मगर आज कुछ बात ही अलग थी।

ज़्यों ही उसका अस्तित्व अपने से निकालने की कोशिश करती तो लगता कि वह लहूलुहान हो जाएगी मगर उसका अस्तित्व नहीं जाएगा।

न जाने इतनी सालों में पतिदेव ने उसके नाम से कितनी बार गाली गलौज किया था। जब भी कोई अपने पति से फरमाइश करती पतिदेव उसका नाम लेकर ताने देकर उसे चुप करा देते थे।

  पति का बदमिजाज स्वभाव रोहिमा ने अपने घरवालों को कभी नहीं बताया था।क्योंकि वह जानती थी कि घर वाले उस पर नहीं पति पर विश्वास करेंगे।और पतिदेव सीधा सपाट जवाब उसके घर वालों को देंगे कि आज तक अपने आशिक को नहीं भूली है। इसलिए मेरे बारे में उल्टा सीधा बोल रही है।

  उसने एक अजीब से चुप्पी साध रखी थी और अपने और गैरों से कटती चली जा रही थी।

   मगर चार दिन पहले उसका अतीत उसके घर से होकर क्या गया कि रोहिमा  तो सुध बुध ही खो बैठी थी।

  चार दिन पहले वह एक सुबह उसने उसके घर पर दस्तक दी। इतवार था पतिदेव घर पर थे। पुराने रिश्तेदार होने के कारण पतिदेव ने उसके सामने एक सामान्य व्यवहार की तरह  स्वागत किया।

साथ में खाना खाया। परंतु फिर ना जाने क्या सोचकर डाइनिंग टेबल से उठकर बाहर चले गए। शायद यह सोच कर कि पुरानी यारी दोस्ती है रोहिमा की। एकांत में कुछ बात कर ले। या भविष्य में ताने सुनाने के लिए फ्यूचर प्लान करने के लिए मौका दे रहे थे। या उनमें कौन सी इंसानियत उस दिन जाग गई थी कि बचपन के दोस्त हैं कुछ खट्टी मीठी यादें ताजा  होंगी। अकेले में ठीक रहेगा जो शायद उनकी उपस्थिति में बात नहीं कर सकते थे

          रोहिमा और अविनाश___

 एकांत पाकर अविनाश की आंखों का सब्र का बांध टूट कर बोला मैं तो अपनी बिंदास रोहिमा को देखने आया था। वही हंसती खिलखिलाती दुनिया से बेपरवाह रोहिमा को देखने आया था। मगर ए क्या तू बिल्कुल जिंदा लाश लग रही है..?

आज रोहिमा ने पहली बार अपने लिए किसी को रोते देखा था। रोहिमा का मन तभी से विचलित हो रहा था।

वह नहीं जानती थी कि अविनाश उसे इतना चाहता है।

 आज उसे  पता चला कि पतिदेव उसके नाम से हमेशा गालियां क्यों देते थे? जो रोहिमा आज तक कभी ना समझ पाई इतने सालों बाद इस चंद मुलाकातों ने समझा दिया।

जो वह अपने भीतर ना देख पाई थी *वह छवि उसके पति को दिखाई देती थी।”

उसे सब कुछ समझ आ गया था।

मगर वक्त बहुत आगे निकल चुका था।

और अविनाश का इस उम्र में उसके मन मस्तिष्क में छा जाना ठीक नहीं था। यही बात रोहिमा अपने आपको बार-बार समझा रही थी।

उसके अस्तित्व को यह कहकर निकालने की कोशिश कर रही थी कि____

 *पतिदेव ही उसके लिए सब कुछ हैं।*

मगर जैसे ही उसे निकालती उसे लगता अपने ही हाथों अपनी चमड़ी खुरच रही है।

अपने आप से जद्दोजहद करने के पश्चात जब वह निढाल हो गई थक कर बिस्तर में जा गिरी। मगर मन मस्तिष्क की अभी जंग जारी थी। और इस जंग को शांत करने के लिए उसके रोम रोम से अविनाश नाम की  रस धार  स्फुटित होने लगी। और अब तो यह लग रहा था की एक-एक रोम से हजार हजार अविनाश नाम की रसधार के फब्बारे स्फुटित हो रहे हों।।

और ____

*अविनाश नाम की रसधार के आसीम फब्बारों के बीच रोहिमा को परमानंद  मिल रहा था।*

Rani blog

9-12-20

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