काश मैं काली होती

दोस्तों यह कहानी आज से लगभग तीन दशक पहले की एक घटना पर आधारित है। कहानी का शीर्षक है__

                       

मीना पड़े पड़े बिस्तर में सोच रही थी कि ,”काश वह काली होती।” .”उसकी सुंदरता कब उसके लिए अभिशाप बन गई।” . उसे पता ही न चला।

टीबी की मरीज होने के कारण मीना करीब आती मौत की घड़ियों की टिक- टिक शायद अच्छे से सुन पा रही थी।

उन मौत की घड़ियों में अपार कष्ट और इस कष्ट से कुछ क्षण बाद निजात मिल जाने का सुख दोनों ही महसूस कर पा रही थी।

उसे याद आया वह दिन जब वह सज-संवर कर अपनी फुफेरी बहन की शादी में शामिल हुई थी। गोरा रंग उस पर हल्के गुलाबी रंग की साड़ी, उसकी सुंदरता पर चार चांद लगा रही थी। जिसे देखकर राजदीप उस पर पागलों की तरह मोहित हो गया था।

जोकि पूरी तरीके से उजड्ड,जाहिल और गंवार भी कह सकते हैं ऐसा इंसान था।

उस शादी से आने के बाद राजदीप ने अपने मां बाप से कहा कि शादी करूंगा तो उसी लड़की (मीना ) से करूंगा। इकलौता बेटा होने के कारण मां बाप को शर्त माननी पड़ी। रिश्तेदारों से पता किया कि मीना किसकी बेटी है और शादी की बात चलाई गई।       इकलौता बेटा था। खानदान अच्छा था और रईस लोग भी थे।

किसी के घर वालों के स्वभाव से तो हर कोई वाकिफ नहीं होता है। क्योंकि जो माता-पिता अपने बेटे बेटी के लिए अच्छे स्वभाव वाले होते हैं, तो जरूरी तो नहीं है कि  बहू के लिए भी उनका स्वभाव अच्छा ही हो।

उसकी शादी हो गई। मीना दुल्हन बनकर ससुराल आ गई। सुहाग सेज में बैठकर मीना इंतजार करने लगी उस इंसान का जो उसे बेपनाह मोहब्बत करता है। ऐसा मीना को लगा या सबको लगता था। पर यह क्या..?

वह तो कमरे में आते ही उस पर जानवरों की तरह झपट  पड़ा।

शायद वह उसकी सुनहरी काया को नोच नोच कर खाना चाहता था। जब उसकी हवस की भूख शांत हुई,… वह सो गया। और उस रात में उसने कितनी बार अपना वहसी पन दिखाया  यह तो बेचारी मीना ही जानती थी।

मीना के दिल के टुकड़े टुकड़े हो गए थे। शायद इस आक्रामक रवैया के लिए मीना तैयार नहीं थी। पर अब कर भी क्या सकती थी? जिस इंसान को देख कर ही उसे घिन आने लगी हो, उस इंसान को अब उसे आखिरी सांस तक पति परमेश्वर मानना था। यहां तक तो बात ठीक थी, मगर कुछ महीने बाद मीना की तबीयत खराब होने लगी। डॉक्टरी जांच के बाद पता चला की मीना को टीबी की गंभीर बीमारी हो गई है।

कुदरत ने उसके हसीन सपनों पर एक और बज्रघात कर दिया।

 उस दिन से ससुराल वालों का व्यवहार मीना के प्रति पूरी तरीके से बदल गया। जो बहू सबकी आंखों का तारा थी अब सबके आंखों की किरकिरी बन चुकी थी।

जो पति उसके बिना एक पल भी नहीं रहता था। वह उसकी तरफ देखना तो दूर उसके कमरे के दरवाजे की तरफ भी नहीं देखता था। जिसमें मीना रहती थी। उसके ससुराल में उसे बाहर एकांत में एक कमरा दे दिया था।

उसकी सास उसे दूर से ही एक अछूत की तरह उसे खाना और दवाइयां दे देती थी। अब इलाज किस तरीके से चल रहा था यह तो किसी को नहीं मालूम। क्योंकि मीना को रत्ती भर भी आराम नहीं मिल रहा था।

जैसे तैसे उसके मायके तक खबर पहुंची। (क्योंकि उस समय तक टेलीफोन सिस्टम नहीं था)। जब उसके पिता आए तो उन्होंने अपनी बेटी की हालत देखी तो समधी और समधन से मिन्नतें की

कि वह उनकी बेटी को उनके साथ जाने दें।

पर ससुराल वालों ने इंकार कर दिया। क्योंकि उनका कहना था कि क्या हम अपनी एकलौती बहू का इलाज नहीं करवा पाएंगे। क्योंकि समाज में उनका बहुत रुतबा था। पर आज से तीन दशक पहले तो यह था कि टीबी का मरीज जल्दी ठीक नहीं हो सकता। या कुछ लोगों की सोच थी कि बचता ही नहीं है। यह ससुराल वाले जानते थे या मानते थे यह उनकी सोच थी।

जो विवाह के समय मध्यस्थ थे मीना के पापा उनको भी लेकर आए, और मध्यस्थ ने भी राजदीप के पापा से आकर कहा कि बहू को मायके जाने दो। पर उन्होंने नहीं भेजा।

मीना आखरी बार अपने पापा से मिली और हाथ जोड़कर बोली कि___

पापा मुझे आखरी बार मेरी मां के पास ले चलो। मैं जानती हूं कि मेरे दिन बहुत ज्यादा नहीं बचे हैं। मैं मां की गोदी में सिर रखकर हमेशा के लिए सोना चाहती हूं

यह सुनकर  “पापा का कलेजा फटा जा रहा था।” शायद सोच रहे थे कि उनकी बेटी फिर से नन्ही गुड़िया बन जाए और अपनी गोद में उठाकर अपने घर ले जाएं। पर जो समाज का कठोर नियम था,उस समय उसके विरुद्ध जाने की उनमें हिम्मत नहीं थी। क्योंकि उनकी अभी तीन बेटियां और थी। बेबस और लाचार पिता उसे नहीं ले जा सके।

क्योंकि बेटियां तो पराया धन होती हैं। पराई अमानत होती हैं। जिस घर में डोली जाती है उसी घर से बेटी की अर्थी निकलती है।

शायद इस सोच ने उन्हें बेबस और लाचार कर दिया था।  पिता के जाने के बाद मीना की सारी उम्मीदें टूट गई और जीने की चाहत भी ना बची । उसी रात वो सोचने लगी कि “काश वो काली होती।” ये इंसान राजदीप मुझे उस शादी समारोह में न देखता तो शायद इतनी जल्दी वह विवाह के बंधन में भी न बंधती। एकाध बसंत तो और मम्मी पापा औरबहनों के संग गुजार लेती। भले ही मैं बीमार होती।

मेरे अपने तो आसपास होते। मैं मां की गोदी में सिर रखकर सकून से मर तो सकती थी।

“काश मैं काली होती।”

” काश मैं काली होती।”

और यही सोचते सोचते मीना हमेशा के लिए चिर निद्रा में सो गई कि__

काश में काली होती।”

“काश में काली होती।”

मध्यस्थ शब्द का अर्थ यहां पर विवाह संबंध में दोनों पक्षों के बीच बातचीत करवाने वाला इंसान।धन्यवाद दोस्तों आशा करती हूं आपको कहानी पसंद आए तो भी फीडबैक की इच्छा जरूर रखूंगी। पढ़ने के लिए बहुत-बहुत आभार।।

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